वो बातें जिनसे मुसलमान इस्लाम से निकल जाता है

Saturday, April 17, 2010 1:09 AM Posted by rafiq khan

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आज के इस दौर में जिहालत की वजह से मुसलमान मर्द और औरतें जो मुंह में
आया बोल दिया करते हैं और कुछ ऐसी बातें भी बोल दिया करते हैं जिनसे आदमी
इस्लाम से निकल जाता है मतलब काफिर हो जाता है और उसका निकाह भी टूट
जाता है और उसे कोई खबर भी नहीं होती.अच्छे पढ़े लिखे लोग भी इस तरह की बातें
अपनी जबान से निकाल दिया करते हैं.इसलिए हम कुछ ऐसी बातें बता रहे हैं जिनसे
हर मुसलमान को बचना चाहिए और अगर खुदा न ख्वास्ता ये कुफ्रिया बातें मुंह से
निकल गई हो तो फ़ौरन अल्लाह से तौबा करें और नए सिरे से कलमा पढ़ कर मुसलमान
बनें और दोबारा निकाह करें.
१.खुदा के लिए स्थान साबित करना.कुछ लोग ये कह दिया करते हैं कि ऊपर अल्लाह
निचे पंच या ऊपर अल्लाह नीचे तुम.ये कुफ्र है.
२.किसी ने किसी से कहा -गुनाह न करो वरना खुदा जहन्नम(नरक) में डाल देगा.उसने
कहा-में जहन्नम से नहीं डरता या ये कहा-मुझे खुदा के अज़ाब की कोई परवाह नहीं.
एक ने दुसरे से कहा-तू खुदा से नहीं डरता उसने गुस्से में ये कहा कि मैं खुदा से नहीं
डरता या ये कहा कि बताओ कहाँ है खुदा.ये सब कुफ्र की बातें है.
३.किसी अमीर आदमी को देख कर ये कहना कि आखिर ये अल्लाह का कैसा इन्साफ है
कि उसको अमीर बना दिया और मुझे गरीब बनाया.ये कुफ्र है.
४.औलाद वगैरह के मरने पर दुःख और गुस्से में ये कहना कि खुदा को मेरा ही बेटा मिला
था मारने को.दुनिया भर में मारने के लिए मेरे बेटे के सिवा खुदा को कोई दूसरा नहीं मिला.
खुदा को ऐसा ज़ुल्म नहीं करना चाहिए था.अल्लाह ने बहुत बुरा किया कि मेरे इकलोते बेटे
को मारकर मेरा घर बेचिराग कर दिया.ये सब बातें बोलने से आदमी काफिर हो जाता है.
५.खुदा के किसी काम को बुरा कहना या खुदा के कामों में बुराई निकालना या खुदा का
मजाक उडाना या खुदा की बेअदबी करना या खुदा की शान में कोई फूहड़ शब्द बोलना ये
सब कुफ्र है.
६.किसी पैगम्बर या फ़रिश्ते के बारे में गुस्ताखी करना या उनको बुरा भला कहना या उनका
मजाक उडाना या उन पर ताना मारना या उनके किसी काम को बेहयाई बताना या बेअदबी
के साथ उनका नाम लेना ये सब कुफ्र है.
७.जो व्यक्ति हुज़ूर मुहम्मद सल्ल: को आखरी नबी(अंतिम पैगम्बर) न माने या हुज़ूर की किसी
चीज या बात की तौहीन करे या बुराई करे या हुज़ूर की किसी सुन्नत को बुरा कहे जैसे दाढ़ी बढ़ाना,
मूंछे कम करना,पगड़ी बांधना,खाने के बाद उँगलियों को चाटना.या सुन्नत का मजाक उडाए.वो
काफिर है.
८. इस्लाम में शक करना और ये कहना कि मालुम नहीं मैं मुसलमान हूँ या काफिर या अपने
मुसलमान होने पर अफ़सोस करना मसलन ये कहना कि मैं मुसलमान हुआ ये अच्छा नहीं हुआ.
काश मैं ईसाई या यहूदी होता तो बहुत अच्छा होता. या किसी कुफ्र की बात को अच्छा समझना.
या किसी को कुफ्र की बात सिखाना या ये कहना कि मैं न हिन्दू हूँ न मुसलमान मैं तो इंसान हूँ.
या ये कहना कि न मेरा मस्जिद से कोई तालुक है ना ही मंदिर से दोनों ढोंग है.मैं किसी को नहीं
मानता.या ये कहना कि काबा(धार्मिक स्थल) तो मामूली पत्थरों का पुराना घर है.इसमें क्या धरा
है जो मैं इसकी ताजीम(सम्मान) करूँ.या ये कहना कि नमाज़ पढना बेकार लोगों का काम है हमें
नमाज़ पढने कि कहाँ फुर्सत है.या ये कहना कि रोज़ा वो रखे जिसको खाना न मिले या ये कहना
कि जब खुदा ने खाने को दिया है तो रोज़ा रख कर क्यों भूखे मरें.या अज़ान की आवाज़ सुन कर
ये कहना कि क्या शोर मचा रखा है.या ये कहना कि नमाज़ पढने का कोई फायदा नहीं.नमाज़
पढना या न पढना बराबर है.या ये कहना कि ज़कात(दान) खुदाई टेक्स है जो मुल्ला मौलवियों ने
मालदारों पर लगा रखा है.इस किस्म की सभी बकवास खुला हुआ कुफ्र है.इन सब बातों से आदमी
काफिर हो जाता है.
९.जो व्यक्ति ये कहे कि मैं शरियत को नहीं मानता या शरियत का कोई हुक्म या फतवा नही मानता
ये सब हवाई बातें है वो काफिर है.
१०.शराब पीते वक़्त,जिना(बलात्कार) करते वक़्त या जुआ खेलते वक़्त बिस्मिल्लाह पढना कुफ्र है.
११.किसी मुसलमान को काफिर और काफिर को मुसलमान कहना कुफ्र है.
१२.खुदा की हराम(निषेध) की हुई चीजो को हलाल(अनुमति) कहना और हलाल को हराम कहना या
खुदा की फ़र्ज़ की गई चीजों में से किसी का इनकार करना या इस्लाम की बुनियादी चीजों तौहीद,
रिसालत,क़यामत,फ़रिश्ते,जन्नत,जहन्नम व आसमानी किताबों में से किसी भी चीज का इनकार
करना कुफ्र है.
१३.कुरआन की किसी आयत का इनकार करना या कुरआन में बुराई निकालना या कुरान की बेअदबी
करना या ये कहना कि कुरआन अल्लाह का कलाम(संवाद) नहीं किसी इंसान का कलाम है या किसी
इंसान की लिखी हुई किताब है.ये सब कुफ्र है.
इन सब के अलावा भी बहुत सी कुफ्रिया बातें लोग बोल दिया करते है.तो मेरे मुसलमान भाई और बहनों
अपनी ज़बान को काबू में रखो और इस तरह की बातों को बोलने और सोचने से किसी भी हालत में बचो.

क़यामत के बारे में अकीदा

Wednesday, April 14, 2010 1:12 AM Posted by rafiq khan

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तौहीद व रिसालत की तरह क़यामत पर भी ईमान लाना जरूरी है.क़यामत का इनकार
करने वाला काफिर है.हर मुसलमान के लिए इस अकीदे पर ईमान लाना जरूरी है कि
एक दिन ये सारी दुनिया जमीन व आसमान बल्कि पूरा ब्रह्माण्ड फना(ख़त्म) हो जायेगा.
इसी का नाम क़यामत या प्रलय है.क़यामत आने से पहले कुछ निशानियाँ ज़ाहिर होंगी
जिनमे से कुछ निशानियाँ ये है-इल्म(ज्ञान) उठ जाएगा.चारों तरफ जिहालत होगी.खुल्लम
खुल्ला बलात्कार व बदकारी होगी.मर्दों की संख्या कम और औरतों की संख्या बहुत ज्यादा
हो जाएगी यहाँ तक कि एक मर्द के साथ पचास औरतें होंगी.अरब देश में खेती,बाग़ और
नहरें हो जाएगी.दीन पर रहना इतना मुश्किल हो जाएगा कि आदमी कब्रस्तान में जाकर ये
तमन्ना करेगा कि काश मैं इस कब्र में होता.लोग इल्मे दीन(धार्मिक शिक्षा) पढेंगे लेकिन
दीन के लिए नहीं.मर्द अपनी बीवी का गुलाम होगा और माँ बाप का नाफरमान.मस्जिदों में
लोग शोर मचाएंगे.गाने बजाने का रिवाज़ बहुत ज्यादा हो जायेगा.गुजरे हुए लोगों पर लोग
लानत करेंगे और बुरा भला कहेंगे.जानवर आदमी से बात करेंगे.ऐसे लोग जिनको तन का
कपडा और जूतियां भी नशीब न थी वो बड़े बड़े महलों में रह कर घमंड करेंगे.वक़्त में बरकत
न रहेगी यहाँ तक कि एक साल एक महीने के बराबर,महिना हफ्ते के बराबर और हफ्ता एक
दिन के बराबर हो जायेगा.इसके अलावा भी बहुत सी निशानियाँ जाहिर होंगी.
अल्लाह व रसूल ने जितनी भी क़यामत की निशानियाँ बतलाई है यकीनन सब जाहिर होकर
रहेंगी.यहाँ तक कि हजरत महदी अलैहिस्सलाम का ज़हूर होगा.दज्जाल आएगा.दज्जाल को
मारने के लिए हजरत ईसा अलैहिस्सलाम आसमान से उतरेंगे.याजूज व माजूज जो बहुत
खतरनाक प्राणी है वो निकल कर पूरी ज़मीन पर फ़ैल जायेंगे.और बड़े बड़े फसाद और बर्बादी
करेंगे.फिर खुदा के कहर से मर जायेंगे.सूरज पक्शिम से निकलेगा.कुरआन के हुरूफ़(अक्षर)
उड़ जायेंगे.यहाँ तक कि दुनिया के तमाम मुसलमान मर जायेंगे और पूरी दुनिया काफिरों से
भर जाएगी.इस तरह जब क़यामत कि निशानियाँ जाहिर हो चुकी होंगी तो अचानक खुदा के
हुक्म से हजरत इस्राफील अलैहिस्सलाम जो एक फ़रिश्ता हैं सुर फूकेंगे जिससे ज़मीन व
आसमान टूट कर टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे.सभी समन्दरों में तूफ़ान आ जायेगा और ज़मीन फटने
से एक समन्दर दुसरे समन्दर से मिल जाएगा.सभी प्राणी इंसान,जानवर,पक्षी सब मर जायेंगे.
सारी दुनिया नेस्त व नाबूद और तहस नहस होकर बर्बाद हो जाएगी.फिर एक मुद्दत के बाद जब
अल्लाह को मंजूर होगा हजरत इस्राफील दोबारा सुर फूंकेंगे.फिर दुनिया दोबारा पैदा हो जाएगी.
और सभी मुर्दे जिन्दा होकर महशर के मैदान में इकट्ठे होंगे जहाँ सबके आमाल(कर्म) तराजू
में तोले जायेंगे.हिसाब किताब होगा.हमारे पैगम्बर हुज़ूर सल्ल: शफाअत फरमाएंगे.नेक लोगों
को जन्नत(स्वर्ग) में भेज दिया जायेगा और गुनहगारों को दोजख(नरक) में डाल दिया जाएगा.

जहन्नम पैदा हो चुकी है.उसमें तरह तरह के अज़ाब के सामान मौजूद है.जहन्नमी लोगों में से
जिन लोगों के दिल में जरा भी ईमान होगा वो अपने गुनाहों की सजा भुगत कर पैगम्बरों और
बुजुर्गों की शफाअत से जहन्नम(नरक) से निकल कर जन्नत में भेज दिए जायेंगे.मोमिन कितना
भी बड़ा गुनहगार क्यों न हो वह हमेशा दोजख में नहीं रहेगा बल्कि कुछ दिनों तक अपने गुनाहों
की सजा भुगत कर जन्नत में भेज दिया जाएगा.कुफ्फार व मुशरिकीन हमेशा हमेशा जहन्नम
में रहेंगे और तरह तरह के अजाबों में गिरफ्तार रहेंगे.
जन्नत भी पैदा हो चुकी है.उसमे तरह तरह की नेअमतों का सामान मौजूद है.खुदा जन्नतियों की
हर ख्वाहिश और तमन्ना को पूरी करेगा.वो हमेशा जन्नत में रहेंगे उनको कभी मौत नहीं आएगी.
शिर्क और कुफ्र के गुनाह को अल्लाह कभी माफ़ नहीं करेगा.इनके अलावा दुसरे छोटे बड़े गुनाहों
को जिसको अल्लाह चाहेगा माफ़ कर देगा जिसको चाहेगा अजाब देगा.

मरने के बाद की दुनिया

Sunday, April 11, 2010 11:44 PM Posted by rafiq khan

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मरने के बाद और क़यामत(प्रलय) से पहले दुनिया और आखिरत के बीच एक और
दुनिया है जिसे आलमे बर्जख या बर्जखी दुनिया कहते हैं.सभी इंसानों और जिन्नात
को मरने के बाद इसी दुनिया में रहना होता है.इस बर्जखी दुनिया में अपने अपने
आमाल(कर्मों) के ऐतबार से किसी को आराम मिलता है किसी को तकलीफ.
मरने के बाद भी रूह(आत्मा) का तालुक बदन(शरीर) के साथ रहता है.रूह बदन से
अलग हो जाती है मगर बदन पर जो आराम या तकलीफ पहूँचती है रूह उसको जरूर
महसूस करती है.
मरने के बाद मुसलमानों की रूहें उनके दर्जात के ऐतबार से मुख्तलिफ मकामात(स्थानों)
में रहती है.कुछ की कब्र पर कुछ की ज़मज़म के कुए में,कुछ की आसमान में,कुछ की
आसमान और ज़मीन के बीच में,मगर रूहें कहीं भी हो उनका जिस्मों से तालुक बराबर
रहता है.जो कोई इनकी कब्र पर आये उसको वह देखते,पहचानते और उसकी बातों को
सुनते हैं.इसी तरह मरने के बाद काफिरों की रूहें उनके मरघट या कब्र पर,कुछ की यमन
के एक नाले बरहूत में,कुछ की सातवीं ज़मीन के निचे,लेकिन रूहें कहीं भी हो उनका तालुक
जिस्मों से बराबर रहता है.जो इनके मरघट या कब्र पर आये उसको देखते,पहचानते और
उसकी बातों को सुनते हैं.
जब आदमी मर जाता है तो अगर ज़मीन में गाड़ा जाए तो गाड़ने के बाद और अगर न गाड़ा
जाए तो वो जहाँ भी हो और जिस हाल में भी हो उसके पास दो फ़रिश्ते आते हैं.एक का नाम
मुन्किर और दुसरे का नाम नकीर.ये दोनों फ़रिश्ते मुर्दे से सवाल पूछते हैं कि तेरा रब कौन है,
तेरा दीन क्या है,और हजरत मुहम्मद सल्ल: कौन है.अगर मुर्दा ईमान वाला हुआ तो ठीक ठीक
जवाब देता है कि मेरा रब अल्लाह है,मेरा दीन इस्लाम है और हजरत मुहम्मद सल्ल: अल्लाह के
रसूल हैं.फिर उसके लिए जन्नत की तरफ से एक खिड़की खोल देते हैं जिससे ठंडी ठंडी हवाएं और
खुशबू कब्र में आती रहती है.और अगर मुर्दा बेईमान हुआ तो सब सवालों के जवाब में यही कहता
है की मुझे कुछ नहीं मालूम.फिर उसकी कब्र में दोजख(नरक) की तरफ से एक खिड़की खोल दी
जाती है और जहन्नम की गरम गरम हवाएं और बदबू कब्र में आती रहती है.और मुर्दा तरह तरह
के सख्त अजाबों में गिरफ्तार होकर तड़पता रहता है.फ़रिश्ते उसको गुर्जों से मारते हैं और उसके
बुरे आमाल(कर्म) सांप बिच्छु बनकर उसे अजाब पहुंचाते रहते है.कब्र में जो कुछ सवाब व अजाब
मुर्दे को दिया जाता है और जो कुछ उस पर गुजरती है वो सब चीजें मुर्दे को मालूम होती है.ज़िंदा
लोगों को इसका कोई इल्म(ज्ञान) नहीं होता.
ये मानना कि मरने के बाद रूह(आत्मा) किसी दुसरे शरीर में चली जाती है बिल्कुल गलत सोच है.
इसका मानना कुफ्र है.

कुरआन के बारे में अकीदा

9:40 AM Posted by rafiq khan

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अल्लाह ने लोगों को हिदायत देने के लिए समय समय पर आसमान से किताबें
(धार्मिक ग्रन्थ) उतारी.अल्लाह ने जितनी भी आसमानी किताबें नाजिल फरमाई
वो सब हक(सत्य) है.और सब अल्लाह का कलाम(संवाद) है.इन किताबों में जो
कुछ इरशाद खुदावन्दी है सब पर ईमान लाना और सच मानना जरूरी है.किसी
एक किताब का भी इनकार कुफ्र है.मशहूर आसमानी किताबें चार है.तोरैत,जबूर
इंजील और कुरआन.तोरैत हजरत मूसा अलैहिस्सलाम पर नाजिल हुई.यह यहूदियों
का धार्मिक ग्रन्थ है.जबूर हजरत दाउद अलैहिस्सलाम पर.यह यहूदियों और ईसाईयों
दोनों का धार्मिक ग्रन्थ है.इंजील हजरत ईसा अलैहिस्सलाम पर.ये ईसाईयों का धार्मिक
ग्रन्थ है.इसे ईसाई बाइबल के नाम से पुकारते हैं.और कुरआन जो सबसे अफज़ल किताब
है हमारे पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्ल: पर नाजिल हुई.
कुरआन को छोड़ कर पिछली दूसरी किताबों की हिफाज़त अल्लाह ने उम्मतियों(लोगों)के
सुपुर्द फरमाई थी मगर उम्मतियों से इन किताबों की हिफाज़त न हो सकी.गलत लोगों ने
इन किताबों में अपनी ख्वाहिश के मुताबिक़ फेरबदल व कमीबेशी कर दी.मुसलमान को
कुरआन के अलावा इन किताबों पर अमल करना जरूरी नहीं.बस ईमान लाना जरूरी है कि
हमारा सब आसमानी किताबों पर ईमान है.
दीने इस्लाम क्योंकि क़यामत तक रहने वाला दीन है.इसलिए कुरआन की हिफाज़त की जिम्मेदारी
अल्लाह ने उम्मत के सुपुर्द नहीं की बल्कि उसकी हिफाज़त खुद अल्लाह ने अपने जिम्मे रखी है.
अल्लाह तआला कुरआन में इरशाद फरमाता है-तर्जुमा-बेशक हमने कुरआन उतारा और यकीनन
हम खुद इसके निगेहबान(रक्षक)है.
इसलिए कुरआन में कोई फेरबदल या कमीबेशी मुमकिन नहीं.और यह कहना कि कुरआन में किसी ने
फेरबदल या कमीबेशी कर दिया है कुफ्र है.
कुरआन किसी ख़ास इलाके या लोगों के लिए नहीं बल्कि क़यामत तक के सभी इंसानों की हिदायत के
लिए नाजिल हुआ.
पिछली किताबें सिर्फ पैगम्बरों को याद हुआ करती थी.लेकिन ये हमारे पैगम्बर मुहम्मद सल्ल: और
कुरआन का मोजजा(करिश्मा) है कि कुरआन को मुसलमान का बच्चा बच्चा याद(कंठस्थ)कर लेता है.
कुरआन अल्लाह का कलाम(संवाद) है.जो ये कहे कि कुरआन पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्ल: का कलाम
है या किसी इंसान का लिखा हुआ है वो काफिर है.

जिन्नात के बारे में अकीदा

Saturday, April 10, 2010 8:49 AM Posted by rafiq khan

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अल्लाह तआला ने जिस मखलूक (प्राणी) को आग से पैदा किया उसे
जिन्न या जिन्नात कहते हैं.हिन्दी में भूत प्रेत जिन्नात को ही कहते हैं.
अल्लाह ने इनको ये ताक़त दी है कि जिस शक्ल को चाहे इख्तियार कर
सकते हैं.इनको और भी ऐसी कई खासियतें दी है जो इंसानों को नहीं दी.
लेकिन फिर भी इंसान को जिन्नात पर फजीलत दी है.ये आम तौर पर
इंसानों को दिखाई नहीं देते.ये इंसानों कि तरह खाते पीते हैं.जीते हैं.मरते
हैं.इनमें मर्द और औरत दोनों होते हैं.इनके बच्चे पैदा होते हैं.इनमें मुसलमान
भी होते हैं काफिर भी.नेक भी होते हैं बदमाश भी.जिन्नात के वजूद का
इनकार करने वाला काफिर है.क्योंकि जिन्नात का वजूद कुरआन से
साबित है.

फरिश्तों के बारे में अकीदा

8:28 AM Posted by rafiq khan

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खुदा की तौहीद और उसके पैगम्बरों पर ईमान लाने के साथ साथ फरिश्तों
के वजूद पर भी ईमान लाना जरूरी है.फरिश्तों के वजूद का इन्कार कुफ्र है.
अल्लाह ने फरिश्तों को नूर से पैदा किया इसलिए वो हमें दिखाई नहीं देते.
और उनको ये ताक़त दी है कि वह जिस शक्ल में चाहे ज़ाहिर हो जाये.
फ़रिश्ते अल्लाह के मासूम बन्दे हैं.वो वही करते हैं जो खुदा का हुक्म होता
है.वो खुदा के हुक्म के खिलाफ कुछ भी नहीं करते हैं.वो हर किस्म के छोटे
बड़े गुनाह से पाक हैं.उनमे गुनाह करने की सलाहियत ही नहीं है.
अल्लाह ने इन फरिश्तों को मुख्तलिफ कामों में लगा दिया है.और जिन जिन
को जो काम सुपुर्द किया है वो उसी में लगे हुए हैं.फरिश्तों की तादाद अल्लाह ही
बेहतर जानता है.फरिश्तों में सबसे ज्यादा मशहूर चार फ़रिश्ते हैं.हजरत जिब्राइल,
हजरत मीकाईल,हजरत इस्राफील और हजरत इजराईल अलैहिस्सलाम.
फरिश्तों की शान में गुस्ताखी करना बहुत बड़ा गुनाह है.

सहाबियों के बारे में अकीदा

Friday, April 9, 2010 11:45 PM Posted by rafiq khan

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हमारे पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल: को जिन खुशनसीब लोगों ने ईमान की
हालत में देखा और ईमान पर ही उनका खात्मा हुआ उन बुजूर्गों को सहाबी कहते
हैं.इन हजरात का सारी उम्मत में सबसे ज्यादा बुलन्द दर्ज़ा है.बड़े से बड़ा वली भी
कम से कम दर्जे के सहाबी के मर्तबे तक नहीं पहुँच सकता.इन सहाबा में सबसे
अफज़ल चार सहाबी हैं.पहले हजरत अबू बक्र सिद्दीक रदियल्लाहू अन्हु.ये रसूल
मुहम्मद सल्ल:के बाद उनके जानशीन हुए और खलीफा बने.तमाम उम्मतियों में
ये सबसे अफज़ल है.उनके बाद हजरत उमर रदियल्लाहू अन्हु का दर्ज़ा है.ये हमारे
रसूल के दूसरे खलीफा है.उनके बाद हजरत उस्मान गनी का दर्ज़ा है.ये हमारे रसूल
के तीसरे खलीफा हैं.उनके बाद हजरत अली रदियल्लाहू अन्हु का दर्ज़ा है.ये हमारे
रसूल के चौथे खलीफा हैं.
हुज़ूर नबीए करीम सल्ल: की निस्बत और तालुक(सम्बन्ध) की वजह से तमाम
सहाबा का अदब व अहतराम और इन बुजूर्गों के साथ मोहब्बत व अकीदत तमाम
मुसलामानों पर फ़र्ज़ है.इसी तरह हुज़ूर सल्ल: की औलाद और बीवियों और अहले बैत
और आपके खानदान वाले और तमाम वो चीजें जिन को आपसे निस्बत व तालुक हो
सबकी ताजीम व अहतराम लाजिम है.

पैगम्बरों व रसूलों के बारे में अकीदा

9:16 AM Posted by rafiq khan

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अल्लाह ने अपने बन्दों की हिदायत के लिए बहुत से पैगम्बरों को दुनिया में भेजा.
ये सब पैगम्बर गुनाहों से पाक है और अल्लाह के बहुत ही नेक बन्दे हैं.सभी पैगम्बर
इंसानों में से पैदा हुए.अल्लाह के सब पैगम्बरों का यही काम है कि वह अल्लाह के
पैगाम(सन्देश) और उसके अहकाम को बन्दों तक पहुंचाए.अल्लाह ने इन पैगम्बरों
की सच्चाई ज़ाहिर करने के लिए इन के हाथों से ऐसी हैरतनाक और ताजुब(अचंभे) में
डालने वाली चीजें जाहिर की जो आम आदमी नहीं कर सकता इनको मोजजा कहते हैं.
जैसे हजरत मूसा अलैहिस्सलाम का असा कि वह अजगर बन कर फिरओन के सामने
जादूगरों के साँपों को निगल जाना,हजरत ईसा अलैहिस्सलाम का मुर्दों को जिन्दा करना,
हमारे नबी हजरत मुहम्मद सल्ल. का डूबे हुए सूरज को लौटाना,और भी बहुत से हैरतनाक
काम ज़ाहिर होना ये सब मोजजात हैं.इन पैगम्बरों को नबी कहते हैं.और इन नबियों में से
जिन पर अल्लाह ने आसमानी किताबें नाजिल की उनको रसूल कहते हैं.सब नबी व रसूल
मर्द(पुरुष) थे.एक भी औरत नबी नहीं हुई.नबी सब इंसानों से ज्यादा अकल्मन्द और बेऐब
यानी बुराई से पाक हैं.
सबसे पहले पैगम्बर हजरत आदम अलैहिस्सलाम है और सबसे आखरी(अन्तिम) पैगम्बर
हजरत मुहम्मद सल्ल: है.बाकी सब पैगम्बर इनके दरमियान हुए.इन पैगम्बरों में जो सबसे
मशहूर है और जिनका जिक्र कुरआन मजीद और हदीसों में आया है वो ये हैं-हजरत आदम
अलैहिस्सलाम,हजरत नूह अ:,हजरत इब्राहीम अ:,हजरत इस्माइल अ:,हजरत इशाक अ:,
हजरत याकूब अ:,हजरत युसूफ अ:,हजरत दाउद अ:,हजरत सुलेमान अ:,हजरत अय्यूब अ:,
हजरत मुसा अ:,हजरत हारून अ:,हजरत जकरिया अ:,हजरत यहया अ:,हजरत इलियास अ:,
हजरत यूनुस अ:,हजरत लूट अ:,हजरत इदरीस अ:,हजरत सालेह अ:,हजरत हूद अ:,हजरत
शुएब अ:,हजरत ईसा अ: और हजरत मुहम्मद सल्ल:
खुदा के पैगम्बरों की तादाद(संख्या) तय नहीं ये खुदा ही बेहतर जानता है.बस यह अकीदा
रखना चाहिए कि हमारा हर पैगम्बर व नबी पर ईमान है.
जिस तरह अल्लाह पर ईमान लाना जरूरी है उसी तरह हर नबी की नबुव्वत पर भी ईमान
लाना जरूरी है.
सभी पैगम्बर और फ़रिश्ते मासूम होते हैं.यानी गुनाहों से पाक होते हैं.नबी और फरिश्तों के
अलावा कोई मासूम नहीं.
पैगम्बरों को कोई ऐसी बीमारी नहीं होती जिससे नफरत हो जैसे कोढ़.
अल्लाह ने अपने कई पैगम्बरों को और विशेष तौर पर आखरी नबी हजरत मुहम्मद सल्ल: को
बहुत सी गैब(गुप्त) की बातों का इल्म(ज्ञान) अता किया.
अल्लाह का कोई वली चाहे कितने ही बड़े मर्तबा वाला हो किसी नबी के बराबर नहीं हो सकता.
पैगम्बरों के मुख्तलिफ दर्जे हैं.सबसे अफज़ल हमारे नबी हजरत मुहम्मद सल्ल: है.उनके बाद
सबसे अफज़ल हजरत इब्राहीम फिर हजरत मुसा फिर हजरत ईसा फिर हजरत नूह अलैहिस्सलाम.
सभी पैगम्बर अपनी अपनी क़ब्रों में ज़िंदा है.
हमारे नबी हजरत मुहम्मद सल्ल: आखरी पैगम्बर है.उनके बाद क़यामत तक कोई दूसरा नबी
नहीं आ सकता.
हमारे नबी हजरत मुहम्मद सल्ल: क़यामत के दिन सब की शफाअत करेंगे.
हुज़ूर मुहम्मद सल्ल: से मोहब्बत ऐन ईमान है.जब तक हुज़ूर सल्ल: की मोहब्बत अपने माँ बाप
औलाद बल्कि पूरी दुनिया से ज्यादा नहो कोई शख्स कामिल मुसलमान नहीं हो सकता.इसके
साथ ही हुज़ूर मुहम्मद सल्ल: के सहाबा(साथियों) व अहले बैत से मोहब्बत रखें.और उनकी इज्ज़त
करें.और हुज़ूर सल्ल: के दुश्मनों से दुश्मनी रखें.चाहे वो अपना बाप,बेटा या रिश्तेदार ही क्यों न हो.
हुज़ूर मुहम्मद सल्ल; का फरमान अल्लाह का ही फरमान है.और हुज़ूर सल्ल: की इताअत(पैरवी)
अल्लाह की ही इताअत है.हुज़ूर सल्ल: की नाफ़रमानी अल्लाह की नाफ़रमानी है.
जो शख्स हुज़ूर सल्ल: को झूठा कहे या उनकी शान में कोई छोटी सी भी गुस्ताखी करे या उनमें कोई
बुराई निकाले या उनकी सुन्नत को बूरा समझे या उनका मज़ाक उडाये वो इस्लाम से खारिज है.

अल्लाह के बारे में अकीदा

Thursday, April 8, 2010 12:30 PM Posted by rafiq khan

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पहले तमाम दुनिया जमीन व आसमान,इन्सान व जानवर वगैरह सारा जहाँ
कुछ भी नहीं था.फिर अल्लाह ने अपनी कुदरत से सबको पैदा किया.
जिसने पूरे आलम(ब्रह्माण्ड) और सारे जहाँ को पैदा किया उसी का नाम अल्लाह है.
अल्लाह एक है.कोई उसका शरीक(साथी) नहीं.वह हमेशा से है और हमेशा रहेगा.
वह किसी का मोहताज नहीं सारी दुनिया उसकी मोहताज है.
वह जिन्दा है.वह हर चीज को जानता है.सब कुछ देख रहा है.सब कुछ सुनता है.
वह सब की जिंदगी और मौत का मालिक है.जिसको जब तक चाहे जिन्दा रखे
जब चाहे मौत दे दे.वही सब को पैदा करता है वही सबको मारता है.वही सबको
रोज़ी(कमाई) देता है.वह जिसको चाहे इज्ज़त देता है जिसको चाहे जिल्लत देता है.
न अल्लाह को किसी ने पैदा किया है ना ही अल्लाह ने किसी को जना है.न उसके
बीवी है ना ही बच्चे.
वह सबका पालनहार है.सब कुछ उसके कब्ज़े में और उसके इख्तियार में है.जिसको
चाहे पस्त करदे जिसको चाहे बुलंद कर दे.जिसकी चाहे रोज़ी कम कर दे जिसकी चाहे
ज्यादा कर दे.वह इन्साफ करने वाला है.वह किसी पर जुल्म नहीं करता.वह गुनाहों को
माफ़ करने वाला है और बन्दों की दुआओं को कबूल करने वाला है.वह सब पर हुक्म
चलाता है उस पर हुक्म चलाने वाला कोई नहीं.न ही उसको उसके इरादे से रोकने वाला
है.दुनिया में जो कुछ होता है उसी के हुक्म से होता है.बगैर उसके हुक्म के एक पत्ता भी
हिल नहीं सकता.वह पूरे ब्रह्माण्ड और सारे जहाँ की हिफाज़त और उसका इंतज़ाम करता
है.न वह कभी सोता है ना ही ऊंघता है.न गाफिल होता है.
वह अपने बन्दों को ऐसे काम का हुक्म नहीं देता जो बन्दों से न हो सके.वह अपने बन्दों
के गुनाहों से नाराज़ होता है और नेकियों से खुश होता है.इसलिए उसने गुनाहगारों के लिए
दोजख(नरक) का अजाब(सज़ा) और नेकी करने वालों के लिए जन्नत(स्वर्ग) बनाई.
दुनिया की जिंदगी में अल्लाह तआला का दीदार सिर्फ पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्ल: ने
किया है और आखिरत में हर मोमिन को अल्लाह तआला अपना दीदार कराएगा.
अल्लाह के किसी काम को बूरा समझना या उस पर ऐतराज़ करना या नाराज़ होना ये
कुफ्र की बातें हैं इनसे बचें.अल्लाह तआला जो कुछ करता है अच्छा करता है चाहे वो हमारे
समझ में आए या ना आए.वह अपने बन्दों पर बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है.

छ: अहम कलमे

Wednesday, April 7, 2010 10:34 PM Posted by rafiq khan

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इन छ: कलमों को अच्छी तरह याद करें और समझें और सच्चे दिल से
इन पर ईमान रखें.ये कलमे ईमान का निचोड़ है.
१.पहला कलमा तय्यब
अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं.हज़रत मुहम्मद
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)अल्लाह के रसूल हैं.
२.दूसरा कलमा शहादत
मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं और
मैं गवाही देता हूँ कि हज़रत मुहम्मद(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
अल्लाह के रसूल है.
३.तीसरा कलमा तमजीद
अल्लाह हर ऐब(बुराई)से पाक है और सब तारीफें अल्लाह के लिए है और
अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं और अल्लाह सबसे बड़ा है
और ताकत व कुव्वत देने वाला सिर्फ खुदा ए बुजुर्ग व बरतर है.
४.चौथा कलमा तौहीद
अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं.वह अकेला है उसका कोई शरीक
नहीं.उसके लिए बादशाही है.उसी के लिए तारीफ़ है.वही जिंदगी देता है और वही
मौत देता है.और वह जिन्दा है कभी नहीं मरेगा.उसके कब्ज़े में हर किस्म की
भलाई है और वह हर चीज पर कुदरत रखता है.
५.पाँचवा कलमा अस्तग्फार
मैं अलाह से माफ़ी मांगता हूँ जो मेरा परवरदिगार है हर गुनाह से जो मैंने जानबूझ
कर किया या भूलकर छुप कर या जाहिर हो कर और मैं उसकी बारगाह में तौबा
करता हूँ उस गुनाह से जिसको मैं जानता हूँ और उस गुनाह को जिसको मैं नहीं
जानता.ऐ अल्लाह बेशक तू गैबों(छुपी हुई चीजों) को जानने वाला और ऐबों(बुराइयों)
को छुपाने वाला और गुनाहों को बख्शने वाला और गुनाह से बचने की ताक़त और
नेकी करने की कुव्वत नहीं मगर अल्लाह की मदद से जो बुलन्द अजमत वाला है.
६.छठा कलमा रद्दे कुफ्र
ऐ अल्लाह बेशक मैं तेरी पनाह चाहता हूँ इस बात से कि मैं जानबूझ कर तेरे साथ
किसी को शरीक ठहराऊं और मैं माफ़ी चाहता हूँ तुझ से उस चीज के बारे में जिसको
मैं नहीं जानता हूँ.तौबा की मैंने उससे और बेजार हुआ कुफ्र से शिर्क से और तमाम
गुनाहों से और इस्लाम लाया मैं और ईमान लाया और मैं कहता हूँ कि अल्लाह के
सिवा कोई इबादत के लायक नहीं.हज़रत मुहम्मद(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
अल्लाह के रसूल है.









ईमान क्या है?

12:08 AM Posted by rafiq khan

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ईमान से मतलब वो बातें जिन पर दिल से ईमान लाना बेहद जरूरी है.
जिन पर ईमान लाये बगैर कोई शख्स मुसलमान नहीं हो सकता.ईमान
इस्लाम में नींव की हैसियत रखता है.जैसे अगर नींव कमज़ोर हो तो
इमारत ढह जाती है उसी तरह अगर ईमान या अकीदा कमज़ोर हो या
इस्लामी अकाइद में कोई शक या शंका हो तो इस्लाम की इमारत ढह
जाती है.मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गुजार
दी लेकिन कलमा तय्यब भी अच्छी तरह याद नहीं और पूरी जिंदगी अपने
आपको मुसलमान कहलवाते रहे.यही हाल आज के पढ़े लिखे नौजवानों का
है जिनको न कलमा अच्छी तरह पढना आता है न ही वो उसका मतलब
जानते हैं.तो मुसलमानों अगर आप भी उनमे से हो तो अपने ईमान को
दुरुस्त करो और इस्लामी अकाइद को जानें और समझें और उन पर सच्चे
दिल से ईमान लाओ.यह याद रखो जब तक ईमान दुरुस्त नहीं होगा कोई
भी अमल नमाज़,रोज़ा,हज्ज,जकात कुछ भी कबूल नहीं होगा.

तो मुसलमान भाइयों सबसे पहले आपको छ: कलमे बताये जायेंगे फिर
दुसरे इस्लामी अकाइद के बारे में बताया जायेगा.अगली पोस्ट का इन्तेजार करें.

इस्लाम क्या है?

Tuesday, April 6, 2010 12:56 AM Posted by rafiq khan

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इस्लाम नाम है उस दीन(धर्म)का,उस तरीके पर जिंदगी गुजारने का जो
अल्लाह के हुक्म से पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. इस दुनिया में लाये.
वैसे तो इस्लाम तब से है जब अल्लाह ने दुनिया बसाई और लोगों को हिदायत
देने के लिए उनके पास पैगम्बर भेजे.सब पैगम्बर इस्लाम की ही तालीम
देते थे.क्योंकि जो हुक्म अल्लाह की तरफ से हो वो इस्लाम में दाखिल है.
लेकिन विशेष तौर पर इस्लाम उस दीन को कहते हैं जो अल्लाह ने कुरान
में फरमाया और अल्लाह के हुक्म से पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्ल. ने
हमें बतलाया सिखाया जो की हदीस के रूप में हमारे पास मौजूद है.और
इंशा अल्लाह क़यामत तक रहेगा.आसान लफ़्ज़ों में कुरान और हदीस में
जो कुछ बताया गया है कि क्या करना चाहिए क्या नहीं वही इस्लाम है.
और इस्लाम की बताई गयी बातों पर अमल करने वाले को मुसलमान
कहते हैं.सिर्फ मुसलमान के घर पैदा होने से कोई भी शख्स मुसलमान
नहीं हो सकता.कोई शख्स तब तक मुसलमान नहीं बन सकता जब तक
वो इस्लाम की बुनियादी चीजों को दिल से कबूल न करे और उन पर अमल
न करे.इस्लाम की बुनियाद पांच चीजों पर है.ईमान,नमाज़,रोज़ा,हज्ज और
जकात.इनके बारे में तफसील से अगली पोस्ट में बताया जायेगा.